‘मैं अटल हूँ’, ये फ़िल्म अटल जी के व्यक्तित्त्व की केवल एक बूंद है- महेश पारीक…जानिए उनके जीवन से जुड़े अनसुने किस्से

महेश पारीक, जयपुर। भारत में कई ऐसे महान पुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपनी बुद्धि और दृढ़ निश्चय से देश को आगे बढ़ाया है। ऐसे ही एक महापुरुष थे अटल बिहारी वाजपेयी। देश के 10वें प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में जितना काम किया है, उससे कई अधिक मेहनत अपनी जिंदगी में की थी। अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक प्रधानमंत्री, राजनेता और और राजनीति से जुड़े इंसान नहीं थे, बल्कि एक कवि, पत्रकार और जेंटलमैन भी थे। आइए जानते हैं उनसे जुड़े जीवन के रोचक किस्से, उनके साथ साए की तरह रहने वाले शिव कुमार पारीक के बेटे महेश कुमार पारीक से-

मेरे पिता शिव कुमार पारीक, 56 वर्षो तक उनके निजी सचिव के रूप में अटल जी के साथ जुड़े रहे, फर्श से लेकर अर्श तक का सफर दोनो ने साथ तय किया, दोनो की मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी, कि दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे, कभी पिताश्री का जयपुर प्रवास एक दो दिन लंबा हो जाता तो अटल जी मुझे फोन करते और चिरपरिचित आवाज़ में मुझसे कहते, “अरे महेश जी शिव कुमार जी को दिल्ली भेजो, मन नही लग रहा।”

उस समय न तो SPG, न ही Z PLUS सिक्योरिटी होती थी तब पिताश्री जो हष्ट पुष्ट थे, 6 फुट से लंबे, बड़ी बड़ी मूंछे उनकी पहचान होती थी, वो हमेशा साये की तरह अटल जी के साथ रहते थे। अटल जी के राजनीतिक जीवन मे हरदम अटल जी पिताश्री से सलाह लिया करते थे। अटल जी के हर चुनाव का संचालन पिताश्री ही किया करते थे, वे कहते थे आप देश का दौरा करिए और आपके चुनाव क्षेत्र की चिंता मुझ पर छोड़ दीजिए।

जब जनता पार्टी में अटल जी विदेश मंत्री बने तब उन्होंने कहा कि शिव कुमार जी, अब आप कोई सरकारी पद ले लीजिए, पिताश्री ने मना कर दिया और कहा कि मेरा प्रण आपकी सेवा का है, सरकार तो आती जाती रहती है। जब अटल जी प्रधानमंत्री बने, तब भी पिताश्री ने PMO में ऑफिस नही रखा, अटल जी को कहा कि यहाँ तो हमारा कोई कार्यकर्ता ही नहीं आ सकता, इसलिए जहाँ 6 रायसीना रोड पर जो अटल जी का बंगला था वहीं अपना आफिस रखा। सैकड़ों कार्यकर्ता उसी ऑफिस में उनसे मिलने आते, अपने-अपने क्षेत्र के कार्य बताते, अपनी परेशानियां बताते, और शिव कुमार जी सबसे बड़े स्नेह से मिलते और सबके कार्य करवाते थे। शिव कुमार जी से मिलने के बाद, हर कार्यकर्ता को लगता था कि, वो अटल जी से मिल लिये।

अटल जी का आखिरी चुनाव लखनऊ से था, उस समय पिताश्री को एक ऐसा कैंसर हुआ जो कि भारत मे पहला और एशिया में तीसरा कैंसर था, वो सबसे खतरनाक कैंसर था, डॉ संदीप गुलेरिया ने उनका आपरेशन किया था, मैं लगातार उनके साथ हॉस्पिटल में रहा, उन्होंने डॉ संदीप गुलेरिया जी को जो बात कही उसको सुन कर मेरी आँखें भर आयी। पिताश्री ने डॉक्टर साहब को कहा कि ये अटल जी का आखिरी चुनाव है और मेरे जीवन का भी आखिरी चुनाव संचालन है, मुझे सिर्फ तीन महीने की ज़िंदगी और दे दो। ये सुन कर हम सब लोग हतप्रभ तो थे ही लेकिन बहुत गर्व भी महसूस कर रहे थे, शिव कुमार जी को अटल के हनुमान कहा जाता था। डॉक्टर साहब के सफल उपचार के संग लखनऊ चुनाव शिवकुमार जी ने संभाला, और सदा की भांति मैं भी उस आखिरी चुनाव का हिस्सा बना। हालांकि इस बार जिम्मेदारी बड़ी थी, क्योंकि पिताश्री अस्वस्थ थे।

जब अटल जी अस्वस्थ हो गए तो सिवा शिव कुमार जी के किसी से बात नही करते थे, इशारों में अपनी बात समझा देते थे, अटल जी ने अंतिम सांस भी शिव कुमार जी की बाहों में ली। उसके पश्चात शिव कुमार जी का मन दिल्ली में नही लगा और वो मेरे पास जयपुर आ गए। जयपुर में भी उनसे मिलने देश भर से कार्यकर्ता लगातार आते रहते।

अटल जी औऱ शिव कुमार जी, दोनों ही राजनीति के दल-दल में, जीवन भर बेदाग रहे, दोनों ही देशभक्त, ईमानदार और कर्मठ व्यक्तित्व के धनी थे। इस फ़िल्म में हालांकि बहुत कुछ अटल जी के बारे में दिखाया है, लेकिन मुझे निजी रूप से लगता है कि अभी बहुत कुछ शेष है, इतने बड़े विशाल व्यक्तित्त्व के लिए ये फ़िल्म एक बूंद है, उस सागर की जो अथाह था, विशाल था।

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